Sunday, April 1, 2012

माँ को समर्पित ....


ज़िन्दगी की तपती धुप में एक ठंडा साया पाया है मैंने...
जब खुली आँख तो अपनी माँ को मुस्कुराते  हुए पाया है मैंने  ...
जब भी माँ का नाम लिया उसका बेसुमार प्यार पाया है मैंने ...
जब कोई दर्द मह्सुश हुआ जब कोई मुश्किल आई
अपने पहलु में अपनी माँ को पाया है मैंने ...
जागती रही वो रात भर मेरे लिए जाने कितनी रातें उसे जगाया है मैंने ..
जिंदगी के हर मोड़ पर जब हुआ गुमराह मैं
इसकी हिदायात पर पकड़ ली सीधी राह  मैंने ..
जिसकी दुआ से हर मुसीबात लौट जाये ..
ऐसा फरिस्ता पाया है मैंने ...
मेरे हर फ़िक्र को जानने वाली मेरे जज्बातों को पहचाने वाली
ऐसी हस्ती पाई है मैंने ...
मेरी ज़िन्दगी सिर्फ मेरी माँ है ..
इसी के लिए तो इस जिंदगी की समां जला रखी  है मैंने ...

1 comment:

  1. अच्छी कविता. माँ के लिए समर्पित कविता. हर कोई अपनी माँ के त्याग को याद करके सम्पूर्ण महिला जगत को उचित सम्मान दे. माँ यानि महिला. माँ यानि आधी आबादी. माँ यानि आधी नहीं पूरी दुनिया.

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