माटी का अपनापन .................
"मै खंडवा में पैदा हुआ अच्छा भला इन्सान था बम्बई आकर कला गीतों का व्यापारी बन गया ।मै चाहता हु की मेरे अंतिम दिन खंडवा में बीते वही की धरती पर पैदा हुआ वही पर चिता ।"ये वो शब्द है जो महान गायक किशोर कुमार जी ने अपनी वसीयत में लिखे थे ।जिनसे पता चलता है की किशोर कुमार जी को अपनी माटी से दूर रहने का कितना दुःख था और हुआ भी यही की उनकी मृत्यु के बाद उनकी चिता खंडवा में ही जली ।
इन्सान जिस माटी में खेला हो ,उसका बचपन बिता हो उससे लगाव तो होता ही है ।उस मिटटी की खुशबु हमारे बचपन ,जवानी की यादो के रूप में हो सकती है ।कभी लगता है हमारा बचपन जिस माटी में बिता है ,जहा पर हमने जीवन बिताया है वहा की माटी हमारे बचपन की छाव थी ,वो धुल भरे मोहल्ले की गलिया या गावो की गलिया और उनमे उडती धुल जब क्रांकीट के रोड नहीं होते थे तो पैरो में धुल ,कपड़ो में धुल और माथे पर धुल जैसे उस मिटटी को हमसे प्रेम हो ।उसके प्यार को हम धूल समझकर झाड़ देते थे लेकिन जब जब उस मिटटी से दूर होते है तो उस धूल का प्यार समझ में आता है ।
हमारे दर्शन में भी कुछ एसे ही कहा गया है "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" मतलब की जन्म देने वाली माँ और जिस भूमि पर जन्म हुआ है ये दोनों स्वर्ग से भी महान है ।हमारे गाव ,शहर ,वहा के बाज़ार सभी वो अपनापन लिए हुए एक हर्दय में स्थायी है इन्हें एक आत्मीयता रखने वाला इन्सान तो कभी भूल नहीं सकता है ।मिटटी ,घर से जुडाव किसी को भी हो सकता है उसके माध्यम अलग अलग हो सकते है ,जुडाव को महसूस करना अलग अलग हो सकता है किसी को यह जुडाव पेड़ की छाव ,बचपन के दोस्तों ,गली में आने वाले कुल्फी वाला हो या कुछ और लेकिन है तो जुडाव ही ना जो हमें महसूस होता है ।
इन्सान जन्म लेता है लेकिन उसे जीवन में जुडाव को खुद महसूस करना होता है ,आत्मीयता सारे अपनेपन का मूल आधार है ।यह अपनापन हमें जब और ज्यादा समझ में आता है जब हम अपने शहर,गाव,कस्बे से दूर होते है ।लेकिन यह अपनापन हमें सुख भी देता है जब हम कही किसी ऐसी घटना या एक ऐसे पल से हमारा वर्तमान टकरा जाता है जिसकी जड़े हमारे बचपन में या पुराने बीते हुए घर ,कस्बे में थी तब हम सोचते है क्या दिन थे ,वे क्या घर था वो ,क्या गलिया थी वो ।
यह भारत की मिटटी की विशेषता है की यहाँ के मानव हर्द्य में अपनी माटी के प्रति लगाव है ।भले ही वर्तमान में मजबूरियों के चलते जैसे नौकरी,धंधे के कारण लोगो को अपनी माटी से दूर रहना पड़े लेकिन उससे आत्मीय जुडाव हमेशा रखे ...अपने घरो की तुलना कभी उन शहरो की बड़ी इमारतो से ,उस धूल को क्रांकीट की सडको से ,उन पेड़ो को बोंसुई और मनीप्लांट से ना करे ।
आज हम देख रहे है की भारत की मानव हर्द्य की अपनेपन की आत्मीयता पर पश्चिमी सोच भारी पढने लगी है युवाओ को पैकेज और आकर्षण के कारण मिटटी की सुगंध नहीं भाती।कुछ लोगो को
महानगरीय जीवन जीने की लालसा इतनी होती है की वो उसके लिए माटी ,घर सब छोड़ने में भी कोई गुरेज नहीं करते है । धन पिपासु लोग धन के पर्याप्त होने पर भी गाव छोड़ने को शहर छोड़ने को उतावले है ।
सभी खाली उड़ना चाहते है लेकिन उस मिटटी से जुड़कर चलना कोई नहीं .........."कुछ भी भूल जाओ मित्रो लेकिन कभी अपनी माटी को मत भूलना " ।
जय भारत वर्ष ..........
"मै खंडवा में पैदा हुआ अच्छा भला इन्सान था बम्बई आकर कला गीतों का व्यापारी बन गया ।मै चाहता हु की मेरे अंतिम दिन खंडवा में बीते वही की धरती पर पैदा हुआ वही पर चिता ।"ये वो शब्द है जो महान गायक किशोर कुमार जी ने अपनी वसीयत में लिखे थे ।जिनसे पता चलता है की किशोर कुमार जी को अपनी माटी से दूर रहने का कितना दुःख था और हुआ भी यही की उनकी मृत्यु के बाद उनकी चिता खंडवा में ही जली ।
इन्सान जिस माटी में खेला हो ,उसका बचपन बिता हो उससे लगाव तो होता ही है ।उस मिटटी की खुशबु हमारे बचपन ,जवानी की यादो के रूप में हो सकती है ।कभी लगता है हमारा बचपन जिस माटी में बिता है ,जहा पर हमने जीवन बिताया है वहा की माटी हमारे बचपन की छाव थी ,वो धुल भरे मोहल्ले की गलिया या गावो की गलिया और उनमे उडती धुल जब क्रांकीट के रोड नहीं होते थे तो पैरो में धुल ,कपड़ो में धुल और माथे पर धुल जैसे उस मिटटी को हमसे प्रेम हो ।उसके प्यार को हम धूल समझकर झाड़ देते थे लेकिन जब जब उस मिटटी से दूर होते है तो उस धूल का प्यार समझ में आता है ।
हमारे दर्शन में भी कुछ एसे ही कहा गया है "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" मतलब की जन्म देने वाली माँ और जिस भूमि पर जन्म हुआ है ये दोनों स्वर्ग से भी महान है ।हमारे गाव ,शहर ,वहा के बाज़ार सभी वो अपनापन लिए हुए एक हर्दय में स्थायी है इन्हें एक आत्मीयता रखने वाला इन्सान तो कभी भूल नहीं सकता है ।मिटटी ,घर से जुडाव किसी को भी हो सकता है उसके माध्यम अलग अलग हो सकते है ,जुडाव को महसूस करना अलग अलग हो सकता है किसी को यह जुडाव पेड़ की छाव ,बचपन के दोस्तों ,गली में आने वाले कुल्फी वाला हो या कुछ और लेकिन है तो जुडाव ही ना जो हमें महसूस होता है ।
इन्सान जन्म लेता है लेकिन उसे जीवन में जुडाव को खुद महसूस करना होता है ,आत्मीयता सारे अपनेपन का मूल आधार है ।यह अपनापन हमें जब और ज्यादा समझ में आता है जब हम अपने शहर,गाव,कस्बे से दूर होते है ।लेकिन यह अपनापन हमें सुख भी देता है जब हम कही किसी ऐसी घटना या एक ऐसे पल से हमारा वर्तमान टकरा जाता है जिसकी जड़े हमारे बचपन में या पुराने बीते हुए घर ,कस्बे में थी तब हम सोचते है क्या दिन थे ,वे क्या घर था वो ,क्या गलिया थी वो ।
यह भारत की मिटटी की विशेषता है की यहाँ के मानव हर्द्य में अपनी माटी के प्रति लगाव है ।भले ही वर्तमान में मजबूरियों के चलते जैसे नौकरी,धंधे के कारण लोगो को अपनी माटी से दूर रहना पड़े लेकिन उससे आत्मीय जुडाव हमेशा रखे ...अपने घरो की तुलना कभी उन शहरो की बड़ी इमारतो से ,उस धूल को क्रांकीट की सडको से ,उन पेड़ो को बोंसुई और मनीप्लांट से ना करे ।
आज हम देख रहे है की भारत की मानव हर्द्य की अपनेपन की आत्मीयता पर पश्चिमी सोच भारी पढने लगी है युवाओ को पैकेज और आकर्षण के कारण मिटटी की सुगंध नहीं भाती।कुछ लोगो को
महानगरीय जीवन जीने की लालसा इतनी होती है की वो उसके लिए माटी ,घर सब छोड़ने में भी कोई गुरेज नहीं करते है । धन पिपासु लोग धन के पर्याप्त होने पर भी गाव छोड़ने को शहर छोड़ने को उतावले है ।
सभी खाली उड़ना चाहते है लेकिन उस मिटटी से जुड़कर चलना कोई नहीं .........."कुछ भी भूल जाओ मित्रो लेकिन कभी अपनी माटी को मत भूलना " ।
जय भारत वर्ष ..........
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